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हम कहाँ जा रहे हैं पता नहीं .....इसे खोजने की एक कोशिश

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सुधीर कुमार सिन्हा


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हम कमजोर हो गए ……

Posted On: 5 Dec, 2013  
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दयालुता कमजोरी नहीं

Posted On: 1 Dec, 2013  
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संत वही जो समाज के लिए हो ।

Posted On: 17 Jul, 2013  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: सुधीर कुमार सिन्हा सुधीर कुमार सिन्हा

के द्वारा: सुधीर कुमार सिन्हा सुधीर कुमार सिन्हा

मन का काम है विषयवस्तु के विम्ब को दृष्टि ,श्रुति , घ्राण , स्वाद और स्पर्श द्वारा प्राप्त करना और उन्हे विचार संवेदनाओं में अनूदित करके निर्णय हेतु बुद्धि के समक्ष प्रस्तुत करना । मानसिक विकास में एवं ज्ञानेन्द्रियों की संवेदनाओं को व्यवस्थित रीति से ग्रहण करने में मन की चंचलता सबसे बड़ी बाधा है । इसके बाद बाद बुद्धि का काम होता है पर मूल में मन ही होता है. हमारी इंद्रियाँ मन के संयोग से ही कार्य करती हैं । मनुष्य मन से देखता , सुनता है । मन इंद्रियों एवं शरीर से पृथक ज्ञान का करण अर्थात साधन है स्थूल शरीर मन की बाहरी परत है । मन शरीर का सूक्ष्म अंश होने के कारण दोनों का एक – दूसरे पर प्रभाव डालता है । यही कारण है कि शरीर का रोग बहुधा मन को प्रभावित कर देता है और मानसिक अस्वस्थता या तनाव शरीर को रुग्ण बना देता है । वर्तमान चिकित्सा विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि शारीरिक रोग मन के अस्वस्थ होने के परिणामस्वरूप ही पनपते हैं । इसलिए मन को साधने पर बल दिया गया है । आपने आखिर में भी बहुत सही बात लिखी है श्री सिन्हा जी की मन के चंचल होने की वजह से ही आदमी मानसिक रूप से अस्वस्थ महसूस करता है ! बहुत सुन्दर , ज्ञानोपयोगी लेखन

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: सुधीर कुमार सिन्हा सुधीर कुमार सिन्हा

आंदोलन तो अपना मकसद नहीं मकसद तो आंदोलन के जरिये विकास करना है और विकास कैसे करना है इसकी योजना और क्रियान्वयन की ब्लू प्रिंट तैयार करना है , लेकिन ऐसा तब भी नहीं हुआ था और आज भी नहीं हो रहा है । दिल्ली में आयोजित रैली के माध्यम से अधिकार प्राप्त करना है पर अधिकार प्राप्त कर क्या करना है इसका ब्लू प्रिंट / एक्शन प्लान भी सामने आना था । अधिकार तो राजनीतिक पार्टियां चुनाव में भी प्राप्त कर लेती हैं पर अधिकार मिलने के बाद अपने चुनावी घोषणा पत्र को भूल जाती हैं । उसका कुछ नहीं हो पाता तो इसका क्या होगा , कुछ तो स्पष्ट होना चाहिए अन्यथा , पिछड़ापन दूर हो जाएगा कह देने मात्र से राज्य को विशेष दर्जा प्राप्त हो जाने के बाद भी शायद पिछड़ापन दूर होना संभव नहीं है । ये एक वोट पाने का बढ़िया और सार्थक ड्रामा था जो कुछ ह्हद तक सफल रहा

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के द्वारा: yatindrapandey yatindrapandey

आज भारतीय किशोर वर्ग में सबसे बड़ी समस्या है कि वह कम से कम समय में अधिक से अधिक लाभ कमाना चाहता है । उसके लिए ज्ञान से ज्यादा अर्थ महत्वपूर्ण है । मन में सर्वश्रेष्ठ बनने की कामना किन्तु उसके अनुरूप व्यवहार एवं कठोर परिश्रम का न होना उनमें असंतोष का सूत्रपात करता है । फलस्वरूप किशोर वर्ग असत की ओर अग्रसर हो जाता है । हम सब महसूस कर रहे हैं कि आज का बालक पूर्ण रूप से अपने भविष्य एवं अपनी सफलता के प्रति अत्यधिक केन्द्रित और जागरूक है । उसके भविष्य और सफलता दोनों के हीं मानदंड भोतिक सुखोपभोग है । अतः वह अपनी भोतिक एवं सांसारिक सफलता के लिए जीवन मूल्यों तथा सिद्धांतों को भी बलि चढ़ा देने में नहीं हिचकता है । आपने बहुत गंभीर विषय को छुआ है ! नैतिक मूल्य तो आज स्कूल और कॉलेज में ही क्या घर में , समाज में सब जगह गिर रहे हैं ! सार्थक लेखन श्री सुधीर कुमार सिन्हा जी !

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श्री कृष्ण ही ऐसे चरित्र हैं जो सभी चुनोतियों का सामना करने में सक्षम हैं । आज जिस प्रकार की समस्या हमारे युवकों के सामने है उनका सामना करने की शिक्षा गीता और उनके चरित्र को पढ़कर प्राप्त की जा सकती है । हनुमान जैसा लगनशील , आत्मविश्वासी बुद्धि विवेक परिश्रमी ,समस्याओं के समाधान दुंढ्ने वाला चरित्र शायद ही कहीं मिले। ऐसे महापुरुषों के चरित्र को भी गलत रूप में परोसना हमारे युवा वर्ग को आत्मिक एवं शारीरिक रूप से कमजोर करने की साजिश नहीं तो क्या है ? इससे तो हमारे जड़ ही कमजोर हो रहे हैं या फिर इसे काटने की तैयारी है । दूसरी ओर धर्म की परिभाषा को विकृत करने का विचार भी तेजी से चल पड़ा है , भारतीय धर्म की आलोचना कर मिशनरियाँ धर्म परिवर्तन करा रही हैं जिसका कुप्रभाव यह हो रहा है कि धर्म के आधार पर भारत के भूभाग को अलग करने की मांग बढ़ रही है । सिक्किम ,वर्मा ,असम ,अरुणाचल प्रदेश इसके उदाहरण हैं । जरा सोचिए , सोचकर आपको लगेगा कि अपने देश का भूखंड अंधकार की जा रहा है और अपने देश का नक्शा छोटा पड़ता जा रहा है । और, समस्या इसी प्रकार बढ़ती रही तो हम और हमारा देश – समाज कहाँ होगा ? बिलकुल सही कह रहे हैं आप ! धर्म न केवल जीने की कला सिखाता है वरन वो परिस्थतियों से मुकाबला करने का साहस भी देता है ! बहुत सुन्दर और ज्ञानवर्धक लेखन !

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के द्वारा: सुधीर कुमार सिन्हा सुधीर कुमार सिन्हा

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ये 'हम' ही सारे फसाद की जड़ और नासूरी विडंबना है, जिसकी या तो पक्की पहचान नहीं है या फिर सब कुछ जानते हुए अपने-अपने परिवार का होने के कारण सभी छिपाए फिरते हैं | दामिनी की मौत पर कैंडल जलाने वाले 'हम' में , अन्ना हजारे के अनशन में जुटने वाले 'हम' में और केजरीवाल के आम आदमी पार्टी वाले 'हम' में ऐसे न जाने कितने हिंस्र बलात्कारी, सरे राह लड़कियों को छेड़ने वाले दुष्ट, भ्रटाचार करने वाले नीच 'हम' शामिल रहे हैं और दिखावा करते रहें हैं कि 'हम' भी शामिल हैं-- बाकी की तो छोडिये ऐसे 'हम' के सुधरने की नहीं, उनके कठोरतम इलाज की बात कीजिये | शेष, नैतिक-सांस्कृतिक अधोपतन पर अत्यंत विचारणीय, पठनीय प्रस्तुति, हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! नव वर्ष की मंगल कामनाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

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आदरणीय सुधीर कुमार सिन्हा जी, नैतिक-सांस्कृतिक अधोपतन पर अत्यंत विचारणीय, पठनीय प्रस्तुति, हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! "अब सवाल यह है कि हमने अपने बच्चों को क्या दिया है जिस कारण हम उससे अच्छे कर्म की अपेक्षा करे ? आज समाज में जिस प्रकार की घटना घट रही है उसके लिए हम चाहे लाख कोस ले पर ज़िम्मेवार तो हम और हमारी शिक्षा है । हमने बच्चों के बचपन को अर्थ के संग्रह में समाप्त कर दिया है । जिस उम्र में उसे संस्कार मिलनी चाहिए उस समय उसे अपने सपनों का संवाहक बनने की प्रेरणा देते हैं । बच्चा न तो स्वय का रह पाता है और न ही समाज ,राष्ट्र का ,वह एक मशीन है ,मशीन से कैसी आशा ? किसी को फांसी चढ़ाने की नौबत न आए ऐसी शिक्षा और वातावरण बनाने की जरूरत है । इसका अर्थ यह नहीं कि ऐसे लोग नहीं होंगे पर कम अवश्य हों ।"

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के द्वारा: सुधीर कुमार सिन्हा सुधीर कुमार सिन्हा

सुधीर जी, मनुश्य जब किसी वस्तु को धर्म, जाति या अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के तराजू पर तोलने लगता है तो मनुष्यता के मूल्यों में ह्वांस होता है. आपके द्वारा बयान की गई घटना के दो पक्ष हैं जिसमें आपका सोचना और उस मकैनिक का सोचना दोनों ही सही हैं. के दिन भर खट कर अपने परिवार का पेट पालने वाला अपने समय और मेहनत को एक अजनबी के लिये दाव पर नहीं लगा सकता. आपको शुक्रगुजार होना चाहिये उसका कि उसने घडी रख कर आपका काम कर दिया और दूसरे दिन पैसे ले कर घडी लौटा दी. मनुष्य की आदत है कि वह सिर्फ़ अपने स्वार्थ के दायरे में सोचता है इसलिये उसे हर घटना में यह दुनिया बहुत बुरी और बेरहम नजर आती है... ऐसा है नहीं... बहुत कुछ अच्छा और जीने लायक है इस धरती पर. व्यक्तिगत विचारों की रवानगी में बहुत कुछ कह गया... अन्यथा न लें... लिखते रहिये... हम पढने के लिये आते रहेंगे.

के द्वारा: Mohinder Kumar Mohinder Kumar

I realize your feeling as I have faced the same circumtances.Inspite of narrating the incidence I would like to express the conclusion which I draw from that event.There is a story written by Munshi Prem Chand in which he has discribed that there was a horse of high class breed belonging to a saint to which he loves more and will not able to depart the horse from him.There was a robber who wants that horsse at any cost for his robbery purpose.but all the efforts become invain..At last he played a drama and he become patient and asked "Baba" to afford a lift over his horse upto a house of physian and the Baba do the same but the betrusted Baba and pushed out the Baba and flew with horse. Baba bried that though you have betrusted me but do not tell this story to any one else otherwise the people will not be helpful in time of one's own exigencies.Now a days the same story is being repeated every where and the peoples are affraid of sincirity and honesty with helping attitude.Now they are facing the "Yathartha" of "Jise maut ne na puncha use zindgi ne mara".This enviorenment is the resultant of our back rulers specially "Angrez" because they always adopted diplomacy in their each dealing which is evident from the fact "Angrzoo ne jiska bhi palloo pakra usi ka unhone palla saf ker diya" which is quite clear from history .This tactics is being adopted by our Political Leaders in succession and through them now it has become a very common practice in the society as well as this evil is also supportd by our judicial system in which "Chor woh hai jis per chori sabit ho nahi to shah bhale hi voh professional Chor ho" This negativism also behaves as a hinderence in postive actions and the common people fears to help the needy person purposely.

के द्वारा: rajendrajee rajendrajee

के द्वारा: सुधीर कुमार सिन्हा सुधीर कुमार सिन्हा

सुधीरभाई नमस्कार भाषा तो पानी है ना । पानी की तरह बहना उस का स्वभाव है । पानी को रोकने से तालाब भर जाता है । नया पानी आने से रोकने का कोइ इलाज नही है तो तलाब को भी खाली करना पडता है । भाषा मे भी नये शब्द, नये जुमले को रोकने का कोइ इलाज नही है, पूराने शब्दों को भूल के भाषा का तालाब अपने आप खाली हो जाता है । भाषा के बहुत बडे तालाब में आम जनता तैर नही सकती । भाषा के अलावा जनता को और भी काम है । भाषा आम जनता की पीडा नही है । लेखकों, साहित्यकारो, संस्क्रुति के पहरेदारो की पीडा हो सकती है, आम जनता को कुछ लेना देना नही है । सब आम जनता के साथ कदम मिला ले किसी को तकलीफ नही होगी । भाषा तो आज जनता ही आगे ले जाती है । -

के द्वारा: bharodiya bharodiya

के द्वारा: sudh sudh

के द्वारा: sudh sudh




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